भारत की राजनीति अब धीरे-धीरे आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही है। वजह साफ है—पैसा। आज के समय में चुनाव लड़ना इतना महंगा हो गया है कि बिना करोड़ों रुपए के मैदान में उतरना लगभग नामुमकिन सा हो गया है। हालात ऐसे हैं कि टिकट मिलने से पहले ही उम्मीदवार करोड़ों रुपए खर्च कर देता है, और चुनाव लड़ने में 10 करोड़ तक खर्च करना अब “नॉर्मल” माना जाने लगा है।
टिकट से पहले ही शुरू हो जाता है खर्च
अक्सर लोगों को लगता है कि पैसा सिर्फ चुनाव के समय खर्च होता है, लेकिन असल कहानी कुछ और ही है। जो लोग राजनीति में आना चाहते हैं, उन्हें पहले अपने इलाके में पहचान बनानी पड़ती है।
- महीनों नहीं, कई बार सालों तक लोगों के बीच रहना पड़ता है
- छोटे-बड़े कार्यक्रम, समाजिक काम, लोगों से संपर्क—सब पर पैसा लगता है
- एक लोकसभा क्षेत्र में ये खर्च 3-4 लाख रुपए हर महीने तक पहुंच जाता है
अगर कोई 2-3 साल तक ये सब करता है, तो टिकट मिलने से पहले ही करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं। और ये पैसा पार्टी नहीं, खुद उम्मीदवार को लगाना पड़ता है।
टिकट भी आसान नहीं, यहां भी खर्च भारी
सिर्फ मेहनत से काम नहीं चलता, कई मामलों में पैसा भी दिखाना पड़ता है। कई नेताओं ने माना है कि पार्टी से टिकट लेने के लिए उन्हें अपनी “आर्थिक ताकत” दिखानी पड़ती है।
- पार्टी फंड में मोटा चंदा देना पड़ता है
- कई बार खुद के अलावा दूसरे उम्मीदवारों को भी सपोर्ट करना पड़ता है
- कुछ राज्यों में टिकट पाने के लिए 3 से 4 करोड़ रुपए तक खर्च करने की बात सामने आई है
यानी टिकट मिलना ही एक तरह से “महंगा सौदा” बन चुका है।
चुनाव लड़ना मतलब करोड़ों का गेम
जब टिकट मिल जाता है, उसके बाद असली खर्च शुरू होता है। आज के समय में लोकसभा चुनाव लड़ना सस्ता नहीं रहा।
- बड़े दलों के उम्मीदवार 5 से 10 करोड़ रुपए तक खर्च कर देते हैं
- अगर मुकाबला बड़ा हो, तो खर्च और बढ़ जाता है
- कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में ये खर्च 100 करोड़ तक भी पहुंच चुका है
बिजनेसमैन का बढ़ता दखल
इतना खर्च बढ़ने के बाद अब राजनीतिक दल भी अकेले ये सब नहीं संभाल पा रहे हैं। ऐसे में वो बिजनेसमैन और उद्योगपतियों का सहारा ले रहे हैं।
- चुनाव के लिए फंडिंग बड़े कारोबारी करने लगे हैं
- कई जगह वही लोग खुद चुनाव भी लड़ रहे हैं
- इससे राजनीति में पैसों का असर और बढ़ गया है
नतीजा ये हो रहा है कि जो पुराने नेता ईमानदारी से काम करते थे लेकिन जिनके पास पैसा नहीं है, वो पीछे छूटते जा रहे हैं।
वोट खरीदने का चलन बढ़ा
सबसे चिंता वाली बात ये है कि अब वोटर्स को सीधे पैसे देने का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है।
- पहले छोटी रकम से काम चल जाता था
- अब कई जगह 2,000 से 3,000 रुपए प्रति वोटर तक दिए जा रहे हैं
- तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में ये रकम 5,000 से 7,000 रुपए तक पहुंच गई है
यानी वोट अब सिर्फ सोच से नहीं, पैसों से भी प्रभावित हो रहे हैं।
सबसे ज्यादा असर किस पर?
इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा नुकसान महिलाओं और युवाओं को हो रहा है।
- जिनके पास पैसा नहीं है, उनके लिए राजनीति में आना मुश्किल
- नए और छोटे नेता उभर नहीं पा रहे
- राजनीति धीरे-धीरे अमीर लोगों तक सीमित होती जा रही है
यानी लोकतंत्र में “बराबरी का मौका” कम होता जा रहा है।
क्या हो सकता है समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो लोकतंत्र पर बड़ा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ जरूरी कदम सुझाए गए हैं:
- चुनावी खर्च पर सख्त नियम बनाए जाएं
- पार्टियों और उम्मीदवारों को अपने खर्च का पूरा हिसाब देना पड़े
- पार्टियों के अंदर भी पारदर्शिता और लोकतंत्र बढ़ाया जाए
- सरकार की तरफ से कुछ फंडिंग दी जाए ताकि सभी को बराबर मौका मिले
आज की राजनीति में “पैसा ही सबसे बड़ा हथियार” बन गया है। बिना पैसों के चुनाव लड़ना अब लगभग असंभव होता जा रहा है। अगर समय रहते इस पर कंट्रोल नहीं किया गया, तो लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाएगा और असली ताकत कुछ गिने-चुने अमीर लोगों के हाथ में सिमट जाएगी।






