Epstein Email Controversy: भारत सरकार ने तथाकथित एपस्टीन फाइल्स से जुड़े एक ईमेल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का जिक्र किए जाने पर कड़ी सख्ती की है। दरअसल, विदेश मंत्रालय ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक दोषी अपराधी की घटिया और निराधार बातें बताया है, जिन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज किया जाना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
बता दें कि यह मामला तब सामने आया जब अमेरिका के न्याय विभाग (US Department of Justice) ने फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन की जांच से जुड़ी फाइलों का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक किया। जिसमें इन फाइलों में तीन मिलियन से ज्यादा पन्नों के दस्तावेज, करीब 2,000 वीडियो और लगभग 1,80,000 तस्वीरें शामिल हैं। इन दस्तावेजों में एक ईमेल का जिक्र सामने आया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी इजरायल यात्रा का उल्लेख किया गया है।
विदेश मंत्रालय का आधिकारिक बयान
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शनिवार शाम इस मुद्दे पर कहा कि सरकार ने मीडिया में चल रही कुछ रिपोर्टों को स्पष्ट करने के लिए यह प्रतिक्रिया दी है।हमने तथाकथित एपस्टीन फाइलों से जुड़े एक ईमेल मैसेज की रिपोर्ट देखी है, जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी इजरायल यात्रा का जिक्र है। जिसमें उनका कहना है कि, जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल की यात्रा पूरी तरह आधिकारिक और सार्वजनिक थी। इसके अलावा, ईमेल में लिखी गई बाकी बातें पूरी तरह निराधार हैं। साथ ही, यह एक दोषी अपराधी की बकवास बातें हैं, जिनका कोई महत्व नहीं है और जिन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर देना चाहिए।
कौन था जेफरी एपस्टीन?
जानकारी के लिए बता दें कि जेफरी एपस्टीन एक अमीर अमेरिकी फाइनेंसर था, जिस पर नाबालिग लड़कियों से जुड़े सेक्स ट्रैफिकिंग के गंभीर आरोप थे। वर्ष 2019 में न्यूयॉर्क की एक जेल में उसकी मौत हो गई थी, जब वह इन मामलों में मुकदमे का इंतजार कर रहा था। वहीं, अमेरिकी अधिकारियों ने उसकी मौत को आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया था, हालांकि इस पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। जिसमें आज शुक्रवार को अमेरिकी न्याय विभाग ने जेफरी एपस्टीन और उसकी करीबी सहयोगी घिसलेन मैक्सवेल से जुड़े मामलों की जांच और मुकदमों से संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करना शुरू किया। बताया जा रहा है कि, यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित एक नए पारदर्शिता कानून के तहत उठाया गया। इस कानून का नाम ‘एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ है, जिसका उद्देश्य इस हाई-प्रोफाइल मामले से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करना है।

क्यों जारी की गईं एपस्टीन फाइल्स?
दरअसल,अमेरिकी न्याय विभाग के डिप्टी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया कि विभाग इस कानून के अनुपालन में तीन मिलियन से ज्यादा पन्नों की सामग्री जारी कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस सामग्री में 2,000 से अधिक वीडियो और लगभग 1,80,000 तस्वीरें शामिल हैं। ब्लैंच के अनुसार, कुल मिलाकर विभाग ने लगभग 35 लाख पन्नों के दस्तावेज जारी किए हैं।
ब्लैंच ने यह भी बताया कि इस समीक्षा प्रक्रिया में 500 से ज्यादा वकील और पेशेवर शामिल थे। इनमें एफबीआई और कई अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालयों के अधिकारी भी शामिल रहे। उन्होंने कहा कि टीमों ने लगभग 75 दिनों तक लगातार काम किया और दिन में दो बार या उससे ज्यादा बैठकें की गईं, ताकि सभी दस्तावेजों की ठीक से जांच हो सके।
सभी दस्तावेज क्यों नहीं किए गए सार्वजनिक?
ब्लैंच का कहना है कि,शुरुआत में विभाग ने छह मिलियन से ज्यादा पन्नों को संभावित रूप से जारी किए जाने योग्य माना था। लेकिन कानूनी प्रावधानों और गोपनीयता से जुड़े मानकों को लागू करने के बाद कम दस्तावेज जारी किए गए। ब्लैंच ने कहा, हमसे शुरुआत में ज्यादा इकट्ठा करने की गलती हो गई थी, लेकिन जरूरी छूट और नियमों के कारण अंतिम संख्या कम हो गई।
भारत का सख्त रुख
भारत सरकार का इस मामले पर कहना है कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम इस मामले में किसी भी तरह से जोड़ना पूरी तरह गलत और भ्रामक है। ऐसे निराधार दावों से सच्चाई पर कोई असर नहीं पड़ता और इन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह मुद्दा पूरी तरह स्पष्ट है और भारत सरकार इस तरह के बेबुनियाद आरोपों को सिरे से खारिज करती है।






