El Nino 2026 Alert: खतरनाक अल-नीनो की दस्तक, कमजोर पड़ सकता है मॉनसून, WMO ने दी बड़ी चेतावनी

El Nino 2026 Alert: खतरनाक अल-नीनो की दस्तक

El Nino 2026 Alert: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने साल 2026 को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है। संगठन के अनुसार, प्रशांत महासागर में अल-नीनो (El Nino) की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और आने वाले महीनों में इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर दिखाई दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अल-नीनो मध्यम से लेकर बहुत मजबूत स्तर तक पहुंच सकता है, जिससे तापमान, बारिश और जलवायु संतुलन प्रभावित होने की आशंका है।

WMO की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है। यही स्थिति अल-नीनो के विकास का मुख्य कारण मानी जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रही तो दुनिया के कई क्षेत्रों में सूखा, हीटवेव और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ सकती हैं।

अल-नीनो क्या है? (What is El Nino?)

अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब पैदा होती है जब प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। यह घटना वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करती है और विभिन्न देशों में बारिश तथा तापमान के पैटर्न को बदल देती है। आमतौर पर अल-नीनो हर 2 से 7 साल के बीच विकसित होता है और इसका प्रभाव लगभग 9 से 12 महीनों तक बना रह सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर तब दिखाई देता है जब यह अपने चरम स्तर पर पहुंच जाता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल-नीनो का प्रभाव उसके विकसित होने के अगले वर्ष अधिक स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।

जून से अगस्त 2026 के बीच बढ़ेगा असर

WMO के नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, जून से अगस्त 2026 के दौरान अल-नीनो सक्रिय रहने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत है। वहीं साल के अंत तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। इस अवधि में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया जाएगा। लगातार बढ़ती गर्मी के कारण हीट स्ट्रेस, जल संकट और कृषि संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

भारत के लिए क्यों चिंता का विषय?

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मॉनसून (monsoon) बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। देश की बड़ी आबादी खेती और वर्षा आधारित जल स्रोतों पर निर्भर करती है। WMO ने दक्षिण एशिया के मौसम विशेषज्ञों के हवाले से कहा है कि अल-नीनो के कारण इस वर्ष मॉनसून सामान्य से कमजोर रह सकता है।

यदि बारिश सामान्य से कम होती है तो फसलों के उत्पादन (Production of Crops) पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा जलाशयों का जल स्तर घटने, पेयजल संकट बढ़ने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने की आशंका भी रहेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों और प्रशासन को अभी से संभावित चुनौतियों के लिए तैयार रहने की जरूरत है।

दुनिया के अन्य हिस्सों पर क्या होगा असर?

अल-नीनो का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण अमेरिका, अमेरिका के दक्षिणी क्षेत्र, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है। इसके कारण बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।

वहीं, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मध्य अमेरिका और कैरिबियाई देशों में शुष्क मौसम और भीषण गर्मी की स्थिति बनने की संभावना जताई गई है। इन क्षेत्रों में जल संकट और जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने भी जताई चिंता

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस (UN Secretary-General Antonio Guterres) ने अल-नीनो को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि दुनिया पहले से ही जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे में एक मजबूत अल-नीनो स्थिति को और गंभीर बना सकता है। बढ़ते वैश्विक तापमान और अल-नीनो के संयुक्त प्रभाव से चरम मौसम की घटनाएं अधिक तीव्र हो सकती हैं। इससे मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ सकता है।

क्या जलवायु परिवर्तन इसका कारण है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो (El Nino) एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है और इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से साबित नहीं हुआ है। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी और महासागर पहले से अधिक गर्म हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में जब अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटना सक्रिय होती है, तो उसके प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं। यही वजह है कि आने वाले महीनों में दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक अल-नीनो की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

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