Supreme Court on Polygamy: भारत में मोदी सरकार के नेतृत्व में तीन तलाक पर पूरी तरह से रोक लगाने के बाद अब मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह पर भी बैन लगाने की खबरें सामने आ रही है। मुस्लिम समाज का यह नियम एक से ज्यादा शादी करने की इजाजत देता है। इसी व्यवस्था को लेकर अब कानूनी बहस तेज हो गई है। मुस्लिम पुरुषों को एक समय में 4 पत्नियां रखने की अनुमति से जुड़े सवाल लंबे समय से अदालतों में उठते रहे हैं। हालांकि, अभी यह कहना उचित नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने 4 शादियों पर बैन कर रही है। क्योंकि अभी मौजूदा कानूनी स्थिति में मुस्लिम पर्सनल लॉ (Muslim Personal Law) के तहत बहुविवाह को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है।
क्या 4 शादियों पर लग सकता है बैन?
मुस्लिम समाज (Muslim Samaj) में बहुविवाह पर रोक की मांग काफी समय से की जा रही है, यह पीछे सबसे बड़ा सवाल संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि अगर देश के अधिकांश नागरिकों के लिए एक से अधिक शादी करना कानूनन अपराध है, तो मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए। इसी आधार पर बहुविवाह को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 की कसौटी पर बना हुआ है। फिलहाल 4 शादियों पर देशव्यापी प्रतिबंध (Nationwide Ban) लागू नहीं हुआ है। देखा जाए तो साल 2026 में भी विभिन्न अदालतों के फैसलों में यह कानूनी स्थिति सामने आई है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम पुरुष (Muslim Men) को एक से अधिक विवाह करने की अनुमति है।
BNS की धारा 82 को लेकर क्या है मामला?
भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 82 में पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना अपराध माना गया है, जो लागू कानून के तहत शून्य हो। जरूरी बात यह है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल व्यक्तिगत कानून की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। जून 2026 में असम हाई कोर्ट के एक मामले में भी अदालत ने पुराने IPC की धारा 494 के समान BNS की धारा 82 के प्रावधानों पर चर्चा की थी, जिसपर अदालत ने साफ तौर पर कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दूसरी शादी अपने आप शून्य नहीं मानी जाती है। इसी वजह से मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी को केवल पहली पत्नी के जीवित होने के आधार पर धारा 82 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले क्या कहते हैं?
वहीं, देखा जाए तो बहुविवाह का मुद्दा नया नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी विवाह, धर्म परिवर्तन और पर्सनल लॉ से जुड़े मामलों में कई जरूरी टिप्पणियां पहले भी कर चुका है। सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (Sarla Mudgal V. Union of India) मामले में अदालत ने कहा था कि पहली शादी खत्म किए बिना केवल दूसरी शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन का इस्तेमाल कानून से बचने का रास्ता नहीं है।
इसके बाद लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में भी अदालत ने इसी तरह की स्थिति को स्पष्ट किया। वहीं 2017 में शायरा बानो बनाम भारत संघ (Shayara Bano vs. Union of India) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत (Talaq-e-Biddat) को असंवैधानिक करार दिया था। तीन तलाक के खिलाफ फैसले के बाद बहुविवाह और निकाह हलाला को लेकर भी संवैधानिक बहस जारी रही है। लेकिन तीन तलाक (Triple Talaq) पर फैसला आने का मतलब यह नहीं है कि बहुविवाह भी अपने आप गैरकानूनी हो गया है।
आगे की कार्रवाई क्या होगी?
अगर बहुविवाह से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा विस्तृत संवैधानिक सुनवाई की जाती है, तो सबसे अहम सवाल यह होगा कि क्या बहुविवाह को धार्मिक स्वतंत्रता (Freedom of Religion) के तहत संरक्षण प्राप्त है या इसे समानता और लैंगिक न्याय (Gender Justice) के आधार पर सीमित किया जा सकता है। वहीं, इस अहम मामले में कोर्ट को साफ तौर पर अनुच्छेद 14, 15, 21 और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेद 25 के बीच संतुलन को भी बनाएं रखना होगा। साथ ही यह सवाल भी जरूरी है कि विवाह और तलाक से जुड़े अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में समानता कैसे सुनिश्चित की जाए।
ये भी पढ़ें: सिम कार्ड को लेकर नए नियम जारी, ज्यादा नंबर होने होगी जांच और कार्रवाई, जानें वजह






